कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ
Computer जिस तरह हम मनुष्यों की पीढियां होती है ठीक उसी प्रकार की भी पीढियां है इसकी शुरुआत 1940 से शुरु हुई थी। हर एक पीढ़ी के अंतर्गत कम्प्यूटर मे कुछ न कुछ विकास किया गया है पहले कम्प्यूटर आकार मे बहुत बड़े हुआ करते थे जो उसकी पीढ़ियों के विकसित होने के साथ-साथ छोटे होने लगे और आज इसका आकार बहुत ही छोटा हो गया है।
कम्प्यूटर कंपनियां बदलती पीढ़ी के साथ नये-नये कामो को अंजाम देती है जैसे:- आकार मे परिवर्तन, गति मे परिवर्तन, नये आविष्कार आदि। ये 1st gen से शुरु होकर आज 9th gen तक आ पहुँची है। कम्प्यूटर के क्षेत्र मे हो रहे निरंतर विकास को देखते हुए ये बोलना गलत नहीं होगा की वो दिन दुर नहीं है जब हम कम्प्यूटर को अपने साथ जेब मे लेकर चल सकेंगे और पहले से अधिक गति के साथ उसका उपयोग कर सकेंगे।
Computer की प्रथम पीढ़ी की शुरुआत सन् 1946 में एकर्ट और मुचली के एनिएक (ENIAC-Electronic Numerical Integrator And Computer) नामक Computer के निर्माण से हुआ था इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब का प्रयोग किया जाता था जिसका आविष्कार सन् 1904 John Ambrose Fleming ने किया था इस पीढ़ी में एनिएक के अलावा और भी।
Generations of Computers
कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – सन् 1946 में प्रथम इलैक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर के विकसित होने के साथ ही, कम्प्यूटर में नित नए शोध विकास की प्रक्रिया अनवरत चल रही है। कम्प्यूटर के सन्दर्भ में पीढ़ी (Generation) का आशय कम्प्यूटर तकनीक में एक नया कदम है। मूल रूप से कम्प्यूटर में प्रयुक्त हार्डवेयर तकनीक के परिवर्तन से पीढ़ी का परिवर्तन दर्शाया गया है।
कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – कम्प्यूटर के आज तक के विकास को पांच पीढ़ियों में बांटा गया है-
- प्रथम पीढ़ी (First Generation) – सन् 1940 से 1956 सन् (वेक्यूम ट्यूब)
- द्वितीय पीढ़ी (Second Generation) – सन् 1956 से 1964 सन् (ट्रांजिस्टर)
- तृतीय पीढ़ी (Third Generation) – सन् 1964 से सन् 1970 (एकीकृत सर्किट)
- चतुर्थ पीढ़ी (Fourth Generation) – सन् 1970 से न् 1980 (माइक्रोप्रोसेसर)
- पंचम पीढ़ी (Fifth Generation) – भविष्य के कम्प्यूटर्स (कृत्रिम बुद्धि)
प्रथम पीढ़ी (First Generation)
सन् 1940 से सन् 1956 तक विकसित हुए Computers को प्रथम पीढ़ी Computers के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है। इस पीढ़ी के Computers में डायोड वाल्व वैक्यूम ट्यूब का प्रयोग किया गया था।
इस डायोड वाल्व नामक वैक्यूम ट्यूब का आविष्कार सर एम्ब्रोज फ्लेमिंग ने सन् 1904 में किया था। इन्हें थर्मोनियोनिक वॉल्व (Thermionic Valve) का नाम भी दिया गया। चूंकि इसमें दो इलैक्ट्रोड्स (Electrodes) होते थे-कैथोड (Cathode) और एनोड (Anode); इसीलिए इसे डायोड (Diode) कहा गया और चूंकि Cathode से इलैक्ट्रॉन Anode की ओर ही जाते थे; इसीलिये इसे वाल्व (Valve) कहा गया।
इसके वाल्व होने के कारण इसे केवल Electronic Switch की भांति प्रयोग किया गया था। ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Calculator) प्रथम Electronic Computer, प्रथम पीढ़ी का कम्प्यूटर है।
बिनॉक (BINAC) का निर्माण ENIAC बनाने वाली कम्पनी ने ही सन् 1949 में किया था। ENIAC और BINAC के निर्माता एकर्ट और माचली ने व्यावसायिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये यूनिवैक (Universal Automatic Calculator-UNIVAC) बनाया। यूनिवैक वह प्रथम Electronic Computer था, जिसका Use आम जनता के बीच किया गया।
सन् 1949 में इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक Computer एडसैक (EDSAC) बनाया। BINAC और UNIVAC में पारे पर डेटा का Store किया जाता था, परन्तु EDSAC में कैथोड रे ट्यूब पर Memory Store होती थी। Electro-Mechanical Computer के निर्माण में अग्रणी I.B.M. ने सन् 1952 में कम्प्यूटर मॉडल-101 बनाया।
इस कम्प्यूटर में Memory Store करने के लिये मैग्नेट टेप के साथ कैथोड और अत्यधिक मेमोरी के लिये चुम्बकीय ड्रम का Use किया गया था। इस कम्प्यूटर में Data Input के लिये Punched Cards का प्रयोग किया जाता था। प्रथम पीढ़ी के अन्य मुख्य कम्प्यूटर्स IBM-650, IBM0702, IBM-704 आदि हैं।
द्वितीय पीढ़ी (Second Generation)
सन् 1956 से सन् 1964 तक विकसित हुए Computers को द्वितीय पीढ़ी के Computers के कहा जाता है। सन् 1948 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने इलैक्ट्रॉनिक टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में एक क्रांति-सी ला दी। द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर्स के वैक्यूम ट्यूब के स्थान पर ट्रांजिस्टर का Use किया गया।
सिलीकॉन युक्त ट्रांजिस्टर के बनने के बाद Computers ही क्या, सभी इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों में डायोड वॉल्व काUse अत्यन्त कम हो गया। सन् 1952 में विकसित हुए Field Effect Transistor को एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पहुंचने में मात्र एक माइक्रोसैकेण्ड ही लगता था।
सन् 1953 में M.रॉस द्वारा बनाये गये ट्रांजिस्टर को एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पहुंचने में लगने वाला Time लगभग एक नैनो सैकण्ड (एक सैकेण्ड का अट्ठारहवां भाग) था। यह ट्रांजिस्टर जरमेनियम (Germanium) का बनाया गया था। द्वितीय पीढ़ी के Computers प्रथम पीढ़ी के Computers की तुलना में आकार में छोटे थे और इनमें ऊष्मा विकरण भी कम होता था।
इन Computers की कार्य करने की गति एवं क्षमता भी इससे पूर्व के Computers की अपेक्षा अधिक थी। सन्1959 में I.B.M. ने पूरी तरह से ट्रांजिस्टर पर आधारित एक Computer बनाया जिसका नाम था MODEL-7090। स्पेरी यूनीवैक-3, हनीवैल 400, 800, CDC 1604, CDC 3600, लियो का Mark-3 आदि द्वितीय पीढ़ी के मुख्य Computers थे।
कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – द्वितीय पीढ़ी के Computers में Moduler Design का प्रयोग होने लगा था। कम्प्यूटर की Programming के लिये Assembly Language का प्रयोग किया जाने लगा। इसमें कुछ विशेष चिन्हों का प्रयोग भी किया जाना था। द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर में Storage के लिये चुम्बकीय कोर का Use किया जाना भी इस समय की एक महत्वपूर्ण घटना थी। चुम्बकीय कोर छोटे-छोटे फैराइट के बने छल्ले थे।
इनका व्यास (Diameter) 0.02 इंच था और इन्हें Clockwise और Anti Clockwise दोनों ओर चुम्बकित (Megnatise) किया जाता था। ये दोनों दिशायें 0 और 1 का प्रतिनिधित्व करती थीं। कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – द्वितीय पीढ़ी के Computers की मेमोरी लगभग 100 किलोबाइट्स थी। इसी दौरान कुछ उच्चस्तरीय Programming Languages Fortran, Cobol आदि का भी विकास हुआ। इस उच्चस्तरीय भाषाओं में अंग्रेजी के शब्दों में ही प्रोग्रामिंग की जा सकती थीं।
तृतीय पीढ़ी (Third Generation)
सन् 1964 से 1970 तक के Computers को Third Generation में रखा गया। इस पीढ़ी के Computers में ट्रांजिस्टर के स्थान पर Integrated Circuits का प्रयोग होने लगा था। एक I.C. में ट्रांजिस्टर, रेजिस्टर और कैपेसिटर तीनों को ही समाहित कर लिया गया।
सन् 1938 में टेक्सास इन्स्ट्रुमेन्ट कम्पनी के J.S. किल्वी ने सिलीकॉन के छोटे से चिप (Chip) पर एक Integrated Circuit बनाया। इस चिप में किसी उपकरण के सरकिट के 26 भागों को अत्यन्त छोटे आकार (नाखून के आकार) की चिप पर उतार लिया गया, जिन्हें तारों से जोड़कर धातु छपे सरकिट्स (DCBS) पर लगाया गया।
कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – इस प्रयोग से सफलता प्राप्त करने के बाद हजारों भागों को छोटे चिप पर बनाया जाने लगा। सन् 1953 में हार्विच जॉनसन ने इस तकनीक को MOSCFET (Metal Oxide Semi-Conductor Field Effect Transistor) के नाम से पेटेन्ट करा लिया।
सन् 1966 में एक ही चिप पर हजारों ट्रांजिस्टर को बना पाना सम्भव हो गया। इस कारण Computers का आकार इससे पहले की पीढ़ियों की तुलना में अत्यन्त छोटा हो गया अर्थात् जहां पहले कम्प्यूटर के लिए एक कमरे की आवश्यकता होती थी, अब एक अलमारी के बराबर स्थान में ही कम्प्यूटर का स्थापन किया जा सकता था।
इस पीढ़ी के Computers में Video Display unit का भी Use होने लगा। इस पीढ़ी के मुख्य Computers I.B.M. का System-360m DEC (Digital Equipment Corporation) का Programable Data Processor-1 (PDP-1), PDP-5, PDP-5, PDP-8, ICL 1900, और UNIVAC 1108 और 9000 थे।
चतुर्थ पीढ़ी (Forth Generation)
सन् 1970 से लेकर 1980 तक के Computers को चतुर्थ पीढ़ी के Computers में रख गया है। Large Scale Integration (LSI) और फिर सन् 1975 में Very Large Scale Integration (VLSI) चिप के निर्माण से पूरी Control Processing Unit का ही एक चिप पर आ पाना सम्भव हो पाया। इन चिपों को Microprocessor और जिन Computers में Microprocessors का Use किया गया, उन्हें Micro Computer कहा गया।
इन्टेल-8080 पर आधारित पहला माइक्रोकम्प्यूटर ‘आल्टेयर’ बनाया गया जिसकी मेमोरी (memory) एक किलोवाट थी।
कम्प्यूटर की पीढ़ियाँ – 1976 के आस-पास अन्य कम्पनीज़ ने भी इस प्रकार के Computer बना लिये, जिनमें से कुछ ने जीलॉग (Zilog) कम्पनी के 7-80 चिप लगाये। कैम्ब्रिज के वैज्ञानिक क्लाइव सिन्क्लेयर ने 1970 में एक छोटा और सस्ता कैलकुलेटर बनाया, जिसके आधार पर जापानियों ने पहले पॉकेट कैलकुलेटर बनाये जो आज घर-घर में पहुंच गये हैं।
सिन्क्लेयन ने Zx-80 नाम का एक छोटा Computer बनाया जिसे रंगीन टी.वी. से जोड़कर स्क्रीन पर Computer के परिणाम देखे जा सकते थे। इस Computer पर अनेक प्रकार के खेल भी खेले जा सकते थे।
1976 में दो अमेरिकी विद्यार्थियों स्टीव बेजनाइक और स्टीव जॉन ने बहुत कम खर्च में एक ऐसा Computer बना डाला जिसे एक माचिस की डिब्बी में बंद किया जा सकता था।
इस खोज ने Computer की दुनिया में क्रांन्ति सी ला दी। इन आठ बिटों पर आधारित माइक्रो कम्प्यूटर को एप्पल नाम दिया गया जिस पर बाद में एप्पल-1 और एप्पल-2 श्रृंखला का निर्माण हुआ। एप्पल-2 पर्सनल कम्प्यूटर नाम दिया गया। अन्य कम्पनियों ने भी अपनी-अपनी तकनीक पर आधारित माइक्रोप्रोसेसर चिप बनाये।
जैसे इन्टेल ने 8080, 8085, 8086, 80286, 80486, पेन्टियम, मोटरोला 6800, 68000 और जीलॉग 7-80, Z-8001 आदि। इस सीरीज के मुख्य Computers एप्पल-1, एप्ल-2 कामडोर का PET, BBC का अकॉर्न, स्पैक्ट्रम आदि हैं। IBM के बनाये गये PC कम्प्यूटर्स ने Computer बाजार पर अधिकार-सा कर लिया। ये Computer निश्चय ही क्षमता में तो एप्पल Computers से कम थे, परन्तु कीमतें अपेक्षाकृत अत्यन्त कम होने के कारण इनका प्रयोग बहुतायत में किया जाने लगा।
पंचम पीढ़ी (Fifth Generation)
वैज्ञानिक अब Fifth Generation के Computers पर कार्य कर रहे हैं। इस Generation के Computers में मानव सदृश गुणों को समाहित करने का प्रयास किया जा रहा है।
जापान के वैज्ञानिकों ने इन Computers के विकास को अपनी योजना का नाम नॉलेज इन्फॉर्मेशन प्रोसेसिंग सिस्टम (Knowledge Information Processing System) अर्थात् किप्स (KIPS) रखा है।
इस पीढ़ी के Computers अभी भी विकास की स्थिति में ही हैं। इन Computers में Artificial Intelligence को प्रयोग करने की योजना है। इनसे Voice Recognition एवं Image Control के कार्य अत्यन्त दक्षता और तीव्र गति से किया जाना सम्भव हो सकेगा।
परन्तु भविष्य में Computer की अब तक की Generation इलेक्ट्रॉन के प्रवाह पर आधारित हैं, पदार्थ के मूलभूत कणों में एक इलेक्ट्रॉन के स्थान पर प्रकाश के मूलभूत कण फोट्रॉन पर आधारित होंगे। लेजर किरणें भी फोट्रॉन से ही बनी होती हैं।


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